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Sunday, 4 October 2020

जो दर्द तुम्हें कभी-कभी होता है वो दर्द मैं हर रोज सहती हूं/ sunday special

 संडे स्पेशल


जो दर्द तुम्हें कभी-कभी होता है वो दर्द मैं हर रोज सहती हूं।




 



दरवाजे की घंटी बजती है और अमृता जाकर दरवाजा खोलती है सागर बिल्कुल थका हारा ऑफिस से आते हैं कमरे के अंदर आते ही सागर धाम से सोफे पर गिर जाता है अमृत पूछती है क्या हुआ सागर
सागर - कुछ नहीं बस थक गया हूं पूरे बदन में दर्द हो रहा है
अमृता - परेशान हो जाती है कल भी आप कह रहे थे कि आपके पूरे शरीर में दर्द हो रहा है
सागर- तुम कब आई हो
अमृता- बस 15 मिनट हुआ है आए हुए मुझे, अमृता तुरंत किचन में जाती है और सागर के लिए कॉफी बनाती है दोनों कॉफी पीते हैं बातचीत करते हैं सागर आराम करने के लिए कमरे में चला जाता है और अमृता रोज की तरह अपने कामों में लग जाती है। जल्दी-जल्दी शाम के खाने की तैयारी करती है और फिर खाना तैयार होने के बाद अमृता सागर को आवाज देती है खाना तैयार है चलिए खाना खा लीजिए
सागर बिस्तर पर लेटा हुआ था
अमृता आकर उसका माथा छूती है बुखार तो नहीं है तुम्हें लगता है अंदरूनी हरारत है हां यार कभी-कभी बदन बहुत दर्द होता है थोड़ा मालिश कर दो सागर ने कहा ,अभी अमृता किचन से निकली ही थी की भागी भागी किचन में गई और सरसों का तेल गर्म करके लेकर आई और सागर की पीठ और कमर पर कंधों पर मालिश करना शुरू कर दिया मालिश से आराम मिलते हैं सागर कब नींद में डूब गया उसे पता ही नहीं चला अमृता सागर की मालिश कर रही थी और किसी सोच में डूब गई जब वो थक जाती थी जरा सी भी थकान होती थी मम्मी तुरंत उसके पैरों की मालिश करती थी। लेकिन अब, अब तो उसे अपने लिए सोचने और करने का समय ही नहीं मिलता मन ही मन सोचती है कि जो दर्द तुम्हें कभी-कभी होता है वो दर्द मैं हर रोज सहती हूं।


औरत की यही जिंदगी है परिवार में कोई बीमार हूं तो उसकी सेवा करो लेकिन जब वह खुद बीमार होती है तो उसकी मदद करने के लिए कोई नहीं होता तब उसे अपने लिए भी खुद करना होता है और परिवार के लिए तो रोज का काम है।

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